Thursday, March 3, 2011

MindHeal Homeopathy


This week, we’re taking a look at Strong Medicine and how allopathy is designed to cause, not cure, disease. We go beyond its clichéd “side-effects” and explore how the disease process cleverly dodges synthetic medicines and burrows deeper and deeper to camouflage itself.
Did you know that regular use of antacids and other synthetic drugs can turn indigestion into arthritis and then cancer at a later stage? No, all that’s gone is not cured!
Click here to discover the mysterious journey of dynamic human energy – in sickness and in health…
www.mindhealhomeoclinic.blogspot.com/2010/11/all-thats-gone-is-not-cured.html
Also, a special takeaway that can help you predict the course of disease with unerring accuracy.
PS: If you like what you read, you may Bookmark this blog or subscribe to the RSS feed to get regular updates. Also, browse through my new News page for the latest global homeopathy news, snippets, information, videos and much, much more!
Re-awaken the healer in you…
- Dr Anita Salunkhe, MD
MindHeal Homeopathy
Gurudev Apartment ‘B’ Wing
Behind Hanuman Mandir
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Mumbai -71
Tel: 25230530
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Wednesday, March 2, 2011

बिलकुल फ्री


अब अपने मोबाइल फोन पर Homoeopathic Mind Journal देखिए बिलकुल फ्री
Dr.Ashok Gupta
Editor-Homoeopathic Mind
Shradha clinic,Bettiah-Bihar

Friday, February 18, 2011

अगरRIGHT SIMILIMUM दवा मिल जाती तो एक केस भी कहीं भी नही जाने वाला था।

अगरRIGHT SIMILIMUM दवा मिल जाती तो एक केस भी कहीं भी नही जाने वाला था।


•To remove mis-conceptions of homoeopathy.
•To provide maximum knowledge of homoeopathy & homoeopathic medicines to all .
•To provide a platform for discussion on homoeopathy.
•Invitation of feedbacks on my homoeopathic articles .
•Invite other homoeopathic doctors to give their suggestions .
•Provide homoeopathic knowledge to homoeopathic students .
•To invite students for their quaries, discussions & other homoeopathic related doubts.
•If somebody wants to know about homoeopathic treatment,they are most welcome.
•Patients who are suffered from different simple to chronic diseases & interested in homoeopathic treatment, are most welcome .
•To introduce about different homoeopathic activities

Monday, January 18, 2010

केस Report

मेरे क्लिनिक में एक नौजवान को लाया गया। नाम.अभिनवए उम्र 30 वर्ष। कष्ट दोनों घुटनों मेंए गलित कुष्ठए बदबूदार। बहुत इलाजए कोई लाभ नही। रोगी अत्यन्त परेशान एवं भयत्रस्त । भय लगता हैए समूचा शरीर रोग्रस्त हो जायेगा। अति भयत्रस्त था । Fear extravagance of के आधार पर opium-30 एक खुराक दियए,पन्द्रह दिन पर आया। वह रोगमुक्त रोग प्रसन्न था ।

केस नं0. 2

एक कुमारी लड़की क्लिनिक में लायी गयी। नाम रागिनीए उम्र 30 सालए बीण्एण्ए बहुत परेशान। दस से उसे मुत्र दूध की तरह हो रहा था। पटना.भागलपुर इलाज में तीस हजार खर्च कर चुकी थी। लाचार थीए परेशान थी। बोली सरए मुझे होमियोपैथी को जानकारी हैं मुझे आशा है इसी से मुझे लाभ होगा। मैं छोटे.छोटे रोग में होमियोपैथी दवा करा चुकी हूँ। इससे बहुत लाभ होता है। Objective resonable & hopeful के आधार पर nm-30 की एक खुराक दिया pl के साथ। तेईस दिन पर आयी। बोलीए वह रोगमुक्त और बिल्कुल ठीक है।

Sunday, January 3, 2010

ग्रेट दिस्कोवेरी-होमिओपेथी

इस सदी का महानतम अविष्कार जिसे इन्सान ने किया- उसे ‘‘इलेक्ट्रीसिटी’’ कहते है, कुछ लोग इस आपति उठाते है और तर्क देते हैं कि यह दुनिया चलती रहती है और आवश्यकता अनुसार अविष्कार किये जाते रहे है क्योंकि ‘‘चक्के’’ के अविष्कार के बाद ‘‘हवाई जहाज’’ एवं ‘‘राॅकेट’’ का भी अविष्कार हुआ जो कि अन्य महानतम अविष्कारों के श्रेणी मे उग्रणीय है । मगर कुछ लोग ऐसे भी है, जो यह कहते हे कि ‘‘न्यूक्लियर एनर्जी का उत्पादन एवं इसका प्रयोग’’ महान अविष्कार है । अब इसका निर्णय कैसे होगा कि कौन सबसे महान अविष्कार है?
आईये, इसको ‘‘मियाज्म’’ के हिसाब से देखते है-
ज्यादातर अविष्कार मनुष्य के जीवन को आराम, आरामदेय और सुख-सुविधाओं के मददेनजर किये गये है, ये sycotic की उत्पति के कारण हुए है । कुछ ऐसे अविष्कार जो प्रकृति के खिलाफ काम करते है और ‘‘मनुष्य जीवन को नाश’’ करने वाले है, चाहे वह स्वयं का हो या दुसरो का, यही नही कोई ऐसा काम, जो किसी भी जीवन के लिए, जो कि पृथ्वी पर है, उसका ‘अनिष्ट’ करने वाला हो या अनिष्ट में सहयोग पहुँचाता है। ये syphilis के उत्पति के कारण होता है और खास तौर से syphilitic व्यक्तियों द्वारा ही अविष्कारित होते हैं, अगर इन व्यक्तियों में syphilitic Miasm मौजूद ना होता तो उनके द्वारा अविष्कार ही नही हो सकता था। और ऐसे अविष्कार जो मनुष्य के ‘‘स्वास्थ्य’’ मंे सुधार करते हो, या सुधार करने में सहायक हो psora की उत्पति के सूचक है और सही मायने में, यही अविष्कार, ‘‘महान अविष्कार’’ कहलाये जाने चाहिए । हमें तो ईश्वरीय स्वरूप में भी ‘‘मियाज्म’’ दिखता है ।
हिन्दू ‘‘धर्मग्रन्थों’’ में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वर्णन मिलता है । आये दिन, इन देवी देवताओं के पूजन समारोह हुआ करता है । हिन्दू धर्म ग्रन्थ के अनुसार श्री ब्रह्मा ‘‘पैदा करने वाले’’ है, श्री विष्णु, ‘‘पालन’’ करने वाले है और महेश यानि कि ‘‘शंकर भगवान’’ संहार करने वाले है । ‘मियाज्मी तौर पर ब्रह्मा ‘जनक’’ यानि कि सोरा, विष्णु ‘‘पालक’’ यानि की साइकोसिस और महेश ‘संहारक’’’ यानि कि सिफलिस ।
ठीक इसी तरह जब हम गहराई से समझते है तो पता चलता है, ‘‘मियाज्म’’ हमारे जीवन के साथ चलते रहता है ।
‘‘श्री वैष्णों देवी का भव्य, मंदिर जम्मू काश्मीर स्टेंट में है, जहाँ हर साल लाखों भक्त जाते है। जहाँ माता वैष्णो, तीन पिड़ियों के स्वरूप में विराजमान है । इन तीनों पिड़ियों में एक माँ सरस्वती, दुसरी माँ लक्ष्मी एवं तीसरी माँ काली की है और इन तीनों शक्तियों के मिले-जुले स्वरूप को माता वैष्णों के रूप में जानी जाती है, मगर इन्हें भी ‘‘मियाज्म’’ के अनुसार देखते है, तो माँ सरस्वती ‘‘सोरा’’ है माँ लक्ष्मी-सायकोसिस और माँ काली- सिफिलस
थोड़ा और आसान शब्दों में कहे तो माँ सरस्वती यानि की ‘‘विद्या’’ यानि की आवश्यकता ये ‘‘सोरा’’ है । माँ लक्ष्मी यानि कि ‘वैभव’ यानि कि ‘विश्वास’’ यानि कि सुख समृद्धि ये साइकोसिस के सूचक है और माँ काली यानि कि ‘संहारक’ यानि कि ‘नाशकर्ता’ सिफिलिस की सूचक है ।
आपको ये सभी बातें एक bouncer की तरह लग रही होगी, जो कि आपके दिमाग में फूट रही होगी । जी, हाँ यह सभी ज्ञान-एक वम्ब की तरह ही है अगर आप इसको अच्छी तरह समझ लें तो यह निश्चित है कि अगर ये समझ मे आ गया तो दुनिया छोटी दिखने लगेगी एवं चिकित्सा के क्षेत्र में जितने अविष्कार अब तक हुए, उन सबसे यह महान ‘अविष्कार’ होगी, आपके लिए ।
यह डा0 हैनिमैन का ही ‘‘सोच’’ था, एक आईडिया था, जिसने होमियोपैथी को इतनी उँचाई पर ले गया और इनके द्वारा ही डा0 बोनिनघसन, डा0 हेंरिंग, डा0 ऐलन, डा0 केन्ट और डा0 वोगर के पास गया । मैं निसंकोच कह सकता हूँ कि पुरी दुनिया में लाखो-करोड़ों होमियोपैथिक टीचर होगें, लेकिन बहुत कम ही होंगे, जिन्होंने उस तरह होमियोपैथी को समझा होगा जिस तरह डा0 हैनिमैन चाहते थे कि समझा जाये ।
यहाँ पर बहुत महान होमियो चिकित्सक है और कुछ तो बहुत अच्छे भेटेरिया मेडिका के शिक्षक भी है, यहाँ तक की होमियोपैथिक फिलास्फी एवं रेपर्टरी, उन्हें ‘‘जुबानी’’ तक याद है मगर डा0 हैनिमैन की सोच तक नही पहुँच पा रहे हैं क्योंकि ऐसी सोच ‘‘आम आदमी’’ के बस का ही नही है, इसके लिए हमें असाधारण परिश्रम करना ही पड़ेगा । इसके लिए हमें अपनी असफताओं से ‘सीखना’ चाहिए कि हम अपने केस में अगर फेल हुए तो क्यों हुए?
हमारी दवा चुनने में कहाँ कमी रह गयी? ‘‘अनुभव’’ द्वारा ही हम इसे जान पाते हैं क्योंकि ‘अनुभव’ ही हमारा सच्चा शिक्षक है जो कि कभी भी ‘गुमराह’ नही होने देता है और मनन करने पर बता देता है कि आप यहाँ पर गलत थे । चाहे हम किसी ‘‘मेथड’ द्वारा रोगियों के लिए दवा का चुनाव करें । परन्तु चाहिए सिर्फ ‘‘एक सिमिलियम रिमेडी’’ ही । पिछले दिनों ‘‘माइंड टेक ऐसोसियसन’ के क्लास में कुछ इसी तरह के अनुतरित प्रश्न डाक्टरों द्वारा पुछे गये थे । कलकता से आये, डा0 बी0 एन0 चक्रवर्ती ने बताया कि ‘होमियोपैथिक माइंड’ पढ़ कर, इनमें कई तरह के असाध्य रोगों में चिकित्सा करने का साहस पैदा हुआ, परन्तु जल्द ही वह ‘‘साहस’’ निराशा में बदल गया और उन्हें आज तक समझ नही आया कि ऐसा कैसे हों गया। उन्होंने बताया कि एक Acute Renal Failure का केस था, जिसमें उन्होंने well Similimum का चुनाव किया एवं Lycopodium का इस्तेमाल रोगी पर किया । अगले सप्ताह रोगी ने रिपोर्ट किया कि बहुत अच्छा है, सभी तकलीफों में ‘आराम’ है और मुझे होमियोपैथी एवं आप पर भरोसा हो गया है, कि अब मैं बच जाउँगा क्योंकि मेरा Serium- Creatinne & Blood Urea घट रहा है। नींद भी अच्छी आ रही है भुख लग रही है और मेरे खाने का रूचि बढ़ गयी है और कल से मैं अपने काम पर भी जा रहा हूँ।
मगर रोगी की यह खुशी ज्यादा दिन तक नहीं रह सकी क्योंकि फिर अचानक धीरे-धीरे रोगी का हालत में गिरावट शुरू हो गयी, जो वजन ‘दवा’ देने के बाद बढ़ रहा था वो घटने लगा, ब्लड प्रेसर भी हाई होने लग गया, कुछ-कुछ सूजन भी बढ़ने लगा। पहले जो Serium- Creatinne & Blood Urea घट गया था वो बढ़ने लगा Bun का लेवल भी बढ़ गया तथा साँस लेने में कठिनाई होने लगा । बार-बार Lycopodium देने के बाद भी सुधार नही हुआ । पोटेन्सी बदल-बदल कर दिया गया मगर जो फायदा पहली खुराक से हुआ था, वो फिर नहीं दिखाई पड़ा । दवा बदल कर भी देखा, मगर कोई फायदा नजर नहीं आया, लाख कोशिश के बाद भी, अन्ततः रोगी मर गया ।
ऐसा क्यों हुआ?
लखनउ से आये, डा0 समीर ने भी इसी तरह के एक रोगी के बारे में बताया कि यह रोगी I.H.D (इसिच्मीक हार्ट डीसिस) का था और काफी चिकित्सा के बाद भी इसे असाध्य मान कर ऐलोपैथो द्वारा मरने के लिए छोड़ दिया गया था, मेरे पास पहुँचा । मैंने काफी मेहनत करके उसके लिए Ars Alb का चुनाव किया एवं दवा दिया, अगले दिन ही सूचना मिली, काफी सुधार है । पाँच महिने तक उतरोतर सुधार होता रहा । रोगिणी जब भी दवा लेने आती थी तो कहती थी, डा0 साहब जब से आपके ईलाज में हूँ बहुत अच्छा महसूस कर रही हूँ। मगर अचानक एक दिन फोन आया कि डा0 साहब जल्दी आईये, रोगिणी की हालत बहुत खराब है । घर जा कर देखा, तो रोगिणी काफी सीरियस नजर आयी, बेहोशी के साथ सांस काफी दिक्कत से ले पा रही थी । आक्सीजन लगाया गया तथा फिर से Ars Alb का प्रयोग किया एवं शाम को खबर तो आयी, मगर पहले के खबर से अलग थी कि रोगिणी को अब किसी दवा की जरूरत ही नही है। शाम होने के पहले ही उसका इन्तकाल हो गया ।
ऐसा क्यों हुआ?
क्या होमियो चिकित्सा, टोना-टोटका की तरह है? या Similia Similibus का सूत्र एक ‘मजाक’ है? इसी तरह के प्रश्न उठते रहे।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या होमियोपेथिक दवाओं की भी कोई ‘सीमा’ है, जहाँ से आगे जा कर यह काम नही करता है?
क्या यह सिर्फ नयी बीमारियों में ही फायदेमंद है?
क्या यह गम्भीर रोगों में क्षणिक फायदा ही पहँचा सकता है?
अगर इन सारे प्रश्नों के जवाब हाँ है तो फिर डा0 हैनिमैन को होमियोपैथी के अविष्कार की जरूरत क्या थी?
क्यों आर्गेमन में पुरानी बीमारियों के चिकित्सा के ही विषय में लिखा गया है?
क्यों हम लोग अक्सर सुनते है कि ‘कैन्सर’ का रोगी होमियो ईलाज से ठीक हो गया ।
क्यों होमियोपैथी द्वारा चमत्कार होते है?
क्यों, ये चमत्कार कुछ रोगों में हो जाते है, सभी में नहीं?
क्या, ये चमत्कार गलती से हो जाते है?
सारे प्रश्नों का ‘‘सार तत्व’’ यह है कि क्यों ‘‘होमियोपैथ्स’’ फेल करते है?
वो कौन से कारण है, जिनके कारण ‘‘होमियोपैथ्स’’ फेल हो जाते है,
हम नित नई-नई दवाआंे के खोज में लगे है, मगर यह नही समझते है कि ‘सल्फर’ जैसी प्योर सोरिक रिमेडी से कैन्सर जैसी सिफिलिटिक रोग कैसे ठीक किया जाता है?
कलकता के डा0 बी0 एन0 चक्रवर्ती जी के किडनी केस में क्या हुआ ।
आइये विवेचना करे-
बीमारी की उत्पति के दौरान प्राथमिक लक्षण उत्पन्न होते है, जिन्हें ऐलोपैथिक दवाओं द्वारा खत्म कर दिया जाता है । ब्लड-प्रेशर एक बड़ा करण हो जाता है, ‘‘किडनी को फेल’’ करने का। अगर ब्लड - प्रेशर हो गया है, तो उसकी ‘‘कारण-चिकित्सा’’ होनी चाहिए, ना कि रूटिन तौर एक दवा, चाहे वो ऐलोपैथिक हो या होमियोपैथिक लगातार खाने रहने पर ‘‘किडनी फेल’ हो जायेगा, इसमें संदेश नही है । इस प्रक्रिया को शरीर क्रिया विज्ञान के आलोक में समझते है- जब ‘‘रेनल अर्टरी’ में छंततवू वाली स्थिति बन जाती है तब खून की सप्लाई किडनी में कम होने लगती है । जब कि किडनी को प्रयाप्त आपूर्ति चाहिए, पर उपरोक्त कारण के वजह से यह सम्भव नही हो पाता है, जिसके कारण शरीर दुसरी तरफ इसकी आपूर्ति की व्यवस्था में लग जाता है और हार्ट पर प्र्रेसर बनाने लगता है कि तुम, अत्याधिक दबाव के साथ खून का संचालन करो ताकि अधिक जोर से खून, झटका देते हुए बढ़े एवं अर्टरी में जो छंततवूमक स्थिति सुधर जाये और किडनी को प्रयाप्त खून मिलने लगे ताकि शरीर पूर्ण रूप से अपना काम करें ।
मगर यहाँ पर कारण चिकित्सा ना करके ब्लड प्रेसर कम करने की दवा चलानी शुरू हो गयी । एण्टी हाइपरटेन्सिव ड्रग ने, चाहे वो होमियोपैथिक हो या ऐलोपैथिक ब्लड प्रेसर को तो कम किया, जिसे आम भाषा में कहा जाता है कि इस दवा से मेरा ब्लड प्रसर कन्ट्रोल हो गया पर किडनी को तो ब्लड की आपूर्ति पुरी मात्रा में तो नही हो रही और धीरे-धीरे और कम सप्लाई होती जायेगी, जिसके कारण किडनी का बचना तो असम्भव ही है यानि कि किडनी फेल हो गयी । क्योंकि किडनी के परेन्चाईमा धीरे-धीरे नष्ट हो रही थी, और यह ब्लड-पे्रसर के कारण नही हुआ बल्कि किडनी में खून की आपूर्ति कम मात्रा में होने के कारण हुआ और यहाँ पर ऐलोपैथिक डाक्टर एक ही सलाह देते है कि अब बिना ‘‘डायलिसिस’’ किये कोई उपाय नही है । डा0 बी0 एन चक्रवर्ती की Lycopodium ने भी ‘‘डायलिसिस’’ का ही काम किया, जिसके कारण रोगी में उतरोतर सुधार होता गया, स्थिति रोज-व-रोज अच्छी दिखाई पड़ने लगी, मगर ‘‘रोग की कारण-चिकित्सा’’ यहाँ भी ना की गयी और रोग धीरे-धीरे sycotic से प्रोग्रेस कर syphilitic में चला गया तब रोगी की हालत खराब होने लगी, अगर इस समय भी रोगी की ‘‘कारण सहित सम्पूर्ण चिकित्सा’’ की जाती तो शायद रोगी आज जीवित होता परन्तु Perfect similimum Remedy रिमेडी तक नही पहुँच पाने के कारण, रोगी मर गया । डा0 हैनिमैन ने अपनी पुस्तक chronic Diseases और आर्गेनन के सूत्र नं0- 205 में लिखा है कि अगर होमियोपैथिक चिकित्सक किसी रोगी में प्राईमरी लक्षणों को नही पाता है, यदि पहले से ही नष्ट हो गये हो तो उसको अब deal with secandory ones की तरह सोचना चाहिए और पता लगाना चाहिए कि इन लक्षणों के पहले कौन से लक्षण उत्पन्न हुए थे यानि कि अगर यह रोगी sycotic state में आया है, तो psora क्या था ? इसका साफ-साफ मतलब है कि chronic diseases or Terminal Cases or Grave Pathological Diseases की चिकित्सा करने के पहले आपको सम्पूर्ण रोगी इतिहास को इस्तेमाल करना पड़ेगा। शायद इसी लिए डा0 हैनिमैन ने लिखा है कि
Cannot be treated with out the Underlying" "Miasm" being taken in to consideration."
जब भी हमलोग होमियोपैथिक दवा का चुनाव करते है, सिर्फ यह नही सोचना है कि लक्षणों से सादृश्य दवा लेना है या क्पेमंेम से सादृश्य दवा चुनना है बल्कि रोगी के इतिहास से भी सादृश्य दवा चुनना है ।

Wednesday, November 11, 2009

Thematic Mind Repertory

Delusions; animals abdomen, are in: croc 162, falco-p 265, oxyg 233, spect. 271, thuj 2058
Delusions; voices, hears, abdomen, are in his: thuj 2058
Dreams; body, abdomen, cut, a big cut in: ozone 227
Dreams; body, abdomen, cut, a big cut in, blood and pus, under which amounts of: ozone 227
Dreams; body, abdomen, cut, a big cut in, tumor, under which grows a: ozone 227
Dreams; body, abdomen, painful: apis 36, choc 222
Dreams; body, abdomen, covered with warts and ulcers: choc 222, junc 36
Dreams; body, abdomen, wind-colic: fago 36
Fear; abdomen, arising from: asaf.
Thoughts; abdomen, as if from : thuj 5
NIT-AC:Al,30- Anxious oppression, like nightmare, as if some one were lying under him and holding him fast with the arms about his abdomen, so that he could not free himself, immediately after falling asleep. (constriction, immobilization)
Abortion
see: Blood, Death, Disease, Fit, Fragile
Anguish; abortion, in threatening: cham 54
Delusions; womb is soft and feeble and would cause abortion: abies-c 85
Dreams; abortion: ign 36, m-arct 5
Dreams; abortion, efforts and plans: ign 36
Fear; abortion, in threatening: bell 26, cimic 54, kali-c 26, op 54, sabin 54
Fear; death, abortion, abort, is sure she will: nux-m 26
Fear; death, abortion, die from hemorrhage, is sure she will: acon 26
Fear; death, abortion, in: acon 26, apis 26, coff 54, gels 26, kali-c 26, nux-m 26, sec 26, stram 26
Suicidal disposition; abortion, in threatening: aur 26
Talk; indisposed, abortion, in threatening: nit-ac 26
ACON:He,51- Ailments from fright: afraid (fear) in dark; vertigo; faintness; trembling; cardiac weakness; threatened miscarriage (abortion); impending cessation of menstrual flow;..
GELS:He,30- Bad effects (ailments) from suddenly hearing bad news; from fright(fear); diarrhea, abortion etc.
Abroad
see: Distances, Fly, Home, Homesickness, Liberty, Nostalgia, Stranger, Travel
Confusion of mind; country, as if now in one, now in another: chlol 36
Delirium; loquacious, foreign countries, of : cann-i 2058
Delusions; abroad, being: verat 30
Delusions; man, talking in foreign languages : stram

Homoeopathy: False or Truth

होम्योपैथी: मिथ्य और सच्चाई

होम्योपैथी एक उत्तम चिकित्सा प्रणाली है जिस में उन बिमारियों का भी इलाज किया जा सकता है जो आध्ुनिक मैडीकल साईंस करने में असमर्थ रहती है। जरुरत है कि मरीज अपनी बीमारी को पूरी तरह ब्यान करे और डाक्टर अच्छी तरह जांच पड़ताल करके उसके लिए एक दवाई का चुनाव करे जो उसके मानसिक लक्षणों को भी महत्ता दे। होम्योपैथी प्रणाली के बारे काफी गल्त धरणाएं प्रचलित हैं। आज उन अलग अलग धरणाओं पर विचार करेंगे और क्या सच्चाई है, यह जानने की कोशिश करेंगे।

1. सब से पहली धरणा तो यह है कि होम्योपैथी धीरे-ध्ीरे असर करती है। अक्सर मरीज कहते हैं कि हम होम्योपैथी इस लिए नहीं लेते क्योंकि इस का असर बहुत देर बार होता है।

सच्चाई: यह धरणा बिल्कुल गलत है। यदि मरीज
Acute [rqjar] अभी हुई बीमारी से पीड़ित होकर आया है तो एक ही पुड़ी उस को रोग मुक्त कर सकती है। बुखार, खांसी, फोड़े फिंसीयों के केसों में हम बहुत बार देखते हैं कि सिर्फ एक ही दवाई 2-3 दिन खाने से मरीज ठीक हो जाता है। पर यदि हमारे पास मरीज ही अपनी बीमारी की आखरी सटेज पर आता है ;जो कि अक्सर देखने में आता हैद्ध और होम्योपैथी को सिर्फ परखने की कोशिश करता है कि बाकी दवाईयां तो बहुत खा ली हैं, चलो होम्योपैथी भी लेकर देख लें, तो यह कैसे सोचा जा सकता है कि इतने वर्ष तो बाकी दवाईयां खा-खा कर शरीर में उन दवाईयों ने घर कर लिया और अब होम्योपैथी की एक पुड़ी जादू दिखा दे। यदि बीमारी पुरानी है तो कुछ समय देना पड़ेगा, होम्योपैथी के ईलाज के लिए। पर इस में भी हमने देखा है कि पुरानी बीमारियों में भी कई बार तुरंत आराम मिल जाता है।

2. होम्योपैथी को एक ऐसी चिकित्सा प्रणाली माना जाता है जिस में सिर्फ पुरानी और लम्बे समय से चली आ रही बीमारियों का इलाज किया जाता है।
सच्चाई: यह धरणा बिल्कुल गलत है। इस में हरेक बीमारी यदि वह नई हो ;भाव थोड़े समय से उत्पन्न हुई होद्ध या पुरानी हो, दोनों का ही ईलाज सम्भव है। बल्कि जितनी बीमारी पुरानी होती है, उस का ईलाज उतना लम्बा हो सकता है और जितनी नई उतना ईलाज भी आसान होता है और मरीज कुछ दिनों में ही ठीक हो जाता है।

3. होम्योपैथी के बारे में यह धरणा प्रचलित है कि यह सिर्फ मीठी-मीठी छोटी गोलियां हैं जो छोटे मोटे रोग बुखार, जुखाम, खांसी आदि ही ठीक कर सकती हैं। सच्चाई: यह धरणा भी बिल्कुल गलत है। कौन कहता है कि बड़ी बीमारियों का ईलाज होम्योपैथी में नहीं है। यदि हम आज इंटरनैट पर ढूंढें तो बहुत डाक्टरों ने उन बीमारियों के ईलाज करके अपनी वैबसाईट पर केस डाले हुए हैं जिन के बारे मार्डन साईंस के पास कोई ईलाज नहीं है। आओ अपनी सोच को आगे बढ़ाएं, बात दरअसल यह है कि हम यह सोच नहीं सकते कि होम्योपैथी दिल, जिगर और गुर्दों आदि के भयानक रोग भी ठीक कर सकती है। फर्क हमारी सोच का है। कमी सिसटम में नहीं, हमारी सोच में है। यदि किसी बीमारी के ईलाज मार्डन साईंस के पास नहीं तो होम्योपैथी को अपनाओ। एक बढ़िया तरीके से ईलाज करवाओ, इस को परखो मत। पूरे विश्वास से दवाई लो।

4. कई मरीज यह समझते हैं कि वह होम्योपैथी इस लिए नहीं लेते क्यों इस में खाने-पीने पर बहुत बंदिशें लग जाती हैं।
सच्चाई: यह धरणा भी बिल्कुल गलत है। बहुत नई-नई खोजें हो रही हैं। जब हम मानसिक लक्षण लेकर मरीज को दवाई देते हैं तो हम कभी भी कोई भी प्रहेज नहीं बताते। देखना सिर्फ यह होता है कि अगर मरीज किसी खास वस्तु से अलर्जी है या किसी खास चीज के प्रति संवेदनशील है तो वह मरीज उस वस्तु को न ले। यह बिलकुल गलत है कि हरेक मरीज प्याज, लहसन, सौंफ, कौफी या ज्यादा तेज पदार्थ न ले। सिर्फ वह वस्तु बंद की जाती है जिस के लिए मरीज संवेदनशील है या जिस चीज से उसको अलर्जी होती है या जिस चीज से मरीज की तकलीफ बढ़ती है जैसे शूगर के मरीजों के मीठी चीजों का प्रहेज करना। मैंने तो अपने 25 वर्षाें के तजुर्बे में यही देखा है कि जब दवाई का चुनाव सही होता है तो वह हर हालत में असर करती ही करती है। यहां एक बात ओर महत्वपूर्ण बताने योग्य है कि जिस चीज से कोई दवाई बनी होती है, उस दवाई के सेवन में वह चीज भौतिक रुप में लेनी बंद की जाती है। जैसे यदि कोई प्याज या लहसन से या हिंग से बनी है तो उसी खास दवाई से वह चीज बंद की जाती है क्योंकि जब होम्योपैथी दवाई बनाई जाती हैं तो इन में मूल तत्व के बहुत कम या नामातर ही अंश रह जाते हैं। इसी लिए यह पोटैंटईज होती हैं और
Dynamic रुप में असर करती मानी जाती हैं।

5. माना जाता है कि होम्योपैथी में ईलाज बहुत लम्बा होता
: यह धरणा बिलकुल गलत है। पहले पहरे में विस्तार पूर्वक बताया जा चुका है कि ईलाज लम्बा नहीं होता। यदि थोड़े समय की बीमारी है तो इस को कम समय लगेगा और यदि मरीज सब तरफ से दवाई खाकर थक कर आया है तो उस का ईलाज लम्बा हो सकता है। यहां यह बात बतानी बहुत महत्वपुर्ण है कि हम अंग्रेजी दवाई तो सारी उम्र खाते रहते हैं, वहां ईलाज लम्बा नहीं लगता और यदि होम्योपैथी कुछ महीने खानी पड़ जाए, जहां ईलाज में मरीज का बीमारी से मुक्त होना सम्भव है, वह मुश्किल लगती है। बड़ी हैरानी और दुख होता है जब आम लोगों में यह धरणा पाई जाती है कि होम्योपैथी को पूरी तरह समझते नहीं।

6. अक्सर मरीज सोचते हैं कि यदि हम होम्योपैथी ईलाज शुरु करेंगे तो अंग्रेजी दवाईयां बंद करनी पड़ेंगी।
सच्चाई: यह धरणा भी गलत है। कई होम्योपैथी डाक्टर भी ऐसे हैं जो मरीज की अंग्रेजी दवाई जो वह कई वर्षों से खा रहा है, एक दम बंद कर देते हैं। बल्ड प्रैश्र, शूगर, थइराइड, मिरगी और कई ऐसी बीमारियां हैं, जिनकी दवाई तुरंत बंद नहीं की जा सकती। यदि हम यह दवाई एक दम बंद कर देंगे तो मरीज का शरीर जो इन दवाईयों से ठीक रहता है, एक दम इन बीमारियों को उभार देगा जो कि मरीज के लिए भी खतरनाक है और होम्योपैथी सिस्टम के लिए भी। पहले एक सही होम्योपैथिक दवाई का चुनाव करो, जब आपको लगे कि मरीज का बल्ड प्रैश्र या शूगर या और बीमारियां थोड़ा ठीक होने की तरफ जा रही हैं तो अंग्रेजी दवाई को कम करके बंद करो। एक ही दिन सब कुछ बंद नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से मरीज ध्ीरे ध्ीरे होम्योपैथी को अपनाने लगेगा। उसका शरीर होम्योपैथी को अपनाने लग जाएगा और दूसरी दवाईयों को छोड़ना उसके लिए आसान हो जाएगा। एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि कोई भी अंग्रेजी दवाई, होम्योपैथी के साथ ली जा सकती है। यह नहीं होता कि अब अंग्रेजी दवाई ली है और होम्योपैथी का असर खत्म हो गया। अंग्रेजी दवाईयां भौतिक स्तर पर काम करती हैं जिनका असर कुछ समय के लिए ही होता है, होम्योपैथी दवाईयां कलदंउपब रुप में काम करती हैं, जिनका असर कई कई हफते, महीने और वर्षों रहता है।

7. अकसर लोगों को यह कहते सुना है कि होम्योपैथी में टैस्टों की कोई जरुरत नहीं।
सच्चाई: यह धरणा बिलकुल गलत है। जी नहीं, हमें भी टैस्टों की उतनी ही जरुरत है जितनी कि मार्डन साइंस को। मान लो किसी मरीज के शरीर के किसी हिस्से में कोई रसौली या पत्थरी है या उस का बल्ड प्रैश्र बढ़ता है या उसकी शूगर बढ़ती है, यदि उसका हमें माप या साईज पता नहीं होगा तो हम यह कैसे बता सकेंगे कि क्या उसका ईलाज होम्योपैथी में सम्भव है या नहीं या उसके ईलाज को कितना समय लग सकता है या क्या आपरेशन ही इसका एक ही इलाज है या मरीज की हालत बहुत गम्भीर है और उसकी जिन्दगी का प्रश्न है। टैस्ट करवाने से हमें मरीज की बीमारी की तीबरता का पता लगता है। हमें बीमारी के नाम के बारे जानने की इतनी जरुरत नहीं होती परन्तु वह बीमारी कितनी बढ़ चुकी है, यह जानने के लिए टैस्ट करवाने बहुत जरुरी हैं।

8. एक और धरणा कि होम्योपैथी पहले बीमारी को बाहर निकालती है और फिर ठीक करती है।
सच्चाई: यह धरणा भी गलत है। होम्योपैथी में बीमारी का बढ़ना एक अच्छा लक्षण माना जाता है पर कितना बढ़ जाना, ऐसे न हो कि मरीज का बुरा हाल ही हो जाए। यदि मरीज की बीमारी बढ़ती भी है पर उसको अंदरुनी मानसिक तौर पर उसकी पीड़ा कम होनी चाहिए। यह माना जाता है कि हमारे शरीर के अन्दर कुछ जहरीला मादा धीरे ध्ीरे जमा होता जाता है जो बढ़ बढ़ कर एक बीमारी का रुप धरण कर जाता है। जब एक सही दवाई का चुनाव होता है तो यह गन्दा मादा [expulsions] के रुप में बाहर निकलना शुरु हो जाता है। मरीज को शौच, उल्टियां, जुकाम, रेशा, गुस्सा बढ़ जाना आदि किसी भी बाहरमुखी द्वार के द्वारा यह मादा बाहर निकलना शुरु हो जाता है। यह कुछ दिनों बाद ठीक हो जाता है पर इन दिनों में मरीज मानसिक रुप में पहले से अच्छा महसूस करता है। यदि मरीज की बीमारी बहुत बढ़ जाती है तो इसका यह भी मतलब है कि दवाई का चुनाव सही नहीं हुआ या दवाई का बीमारी पर असर नहीं हुआ या एक और लक्षण भी हो सकता है कि दवाई की ताकत बहुत हल्की या ज्यादा दी गई।

9. एक बहुत ही महत्वपूर्ण गलत धरण है कि होम्योपैथी में सटीराईड [steroids] इस्तेमाल किया जाता
: यह धरणा तो बिलकुल गलत है। पहली बात तो यह है कि होम्योपैथी में कोई भी सटीराईड नहीं होते। दूसरी बात यह कि मरीज तो हमारे पास पहले से ही इतनी ताकतवर
Antibiotics और steroids खाकर आए होते हैं और हम उनको सटीराईड क्या दें। यहां साथ ही मैं एक चेतावनी भी देना चाहती हूं कि जो डाक्टर कई कई दवाईयां मिला कर, पीस कर बड़ी बड़ी पुड़ियां बना कर देते है, उनसे सावधन रहें।

10. यह धरणा कि होम्योपैथी सिर्फ छोटी छोटी मीठी गोलियों की चिकितसा प्रणाली है जिस को लोगों ने पलैसीबो थिरैपी का नाम भी दिया है क्योंकि वैज्ञानिकों ने किसी भी दवाई की 12ब् या 24ग ताकत के बाद दवाई के भौतिक तत्व नहीं ढूंढते।
सच्चाई: यह धरणा बिलकुल गलत है कि यह एक पलैसिबो थिरैपी है। पर साथ ही यह भी एक सच्चाई है कि वैज्ञानिकों को किसी भी दवाई की 12c या 24x ताकत के बाद दवाई के भौतिक तत्व नहीं मिलते। दुनियां भर के सब होम्योपैथिक डाक्टरों का मानना है कि जैसे जैसे दवाई की ताकत बढ़ती है, चाहे उस में भौतिक तत्व और कम हो जाते हैं, पर उस की मरीज को ठीक करने की ताकत और बढ़ जाती है। यह एक बार नहीं, सौ बार भी नहीं, हजार बार नहीं, बल्कि लाखों करोड़ों बार बार-बार अजमाया जा चुका है। यदि यह पलैसिबों थिरैपी होती तो इस का असर छोटे बच्चों और जानवरों पर कैसे होता? रसौलियां, पत्थरियां, भौरियां पर कैसे होता? होम्योपैथी जानवरों के केसों पर बहुत लाभदायक सि( हुई है। शायद अभी वैज्ञानिक इतनी ज्यादा खोज करने में असमर्थ हैं, पर आने वाले समय में इन धरणाओं द्वारा ही प्रमाणित किया जाएगा। उस समय इस प्रणाली को पलैसिबो थिरैपी नहीं माना जाएगा बल्कि मार्डन सिस्टम के बराबर माना जाएगा।

11. एक और धरणा कि होम्योपैथी के गलत असर [side effect] नहीं होते।
सच्चाई: यह धरणा भी गलत है। कौन कहता है कि कोई भी चीज जो हमारे शरीर के अंदर जाती है, कोई भी असर नहीं करती। यह क्यों माना जाता है इस के गलत असर नहीं होते। क्यों आज तक यह उन लोगों के हाथों में रही, जिन्होंने सिर्फ इसको शौंक के तौर पर अपनाया। अकसर देखा गया है कि होम्योपैथी को लोगों ने एक काम के तौर पर नहीं बल्कि लोगों की सेवा और मनोरंजन के लिए अपनाया। कुछ किताबें पढ़ीं और 2-4 शीशी दे दीं। चाहे इस का असर सीध्े तौर पर गलत असर कम होता है पर डा. हैनीमैन के समय से यह किताबों में लिखा हुआ है कि यदि यह दवाईयां बिना किसी बीमारी के हर रोज ली जाएं तो कुछ समय बाद यह उस इनसान के अन्दर अपने लक्षण पैदा कर देती हैं। मनुष्य के शरीर में जो दवाई बार बार, बिना डाक्टर की सलाह से ली जाए, उस का कोई न कोई गलत असर जरुर हो सकता है। आज के समय में हमारे डाक्टर एम.डी. की डिगरी कर रहे हैं, और बड़ी योग्यताएं प्राप्त कर रहे हैं और साथ में यह भी प्रचार करते हैं कि दवाई का इस्तेमाल हल्की मात्रा के अनुसार ही करना चाहिए। पूरे पंजाब में क्या, पूरे देश भर में यह लहर चल रही है कि एक ही सही दवाई का चुनाव करो और उसको हल्की मात्रा में दो ताकि बाद में कोई भी गम्भीर प्रणाम न भुगतना पड़े।

मेरा यह लेख लिखने का उद्देश्य पाठकों के मनों में होम्योपैथी से जुड़े भ्रम दूर करना था और मैं उम्मीद करतa हूं कि मेरा यह सन्देश आम जन साधरण तक जरुर पहुंचेगा और होम्योपैथी को और आगे लेकर जाएगा। होम्योपैथी को छोटी मीठी गोलियों वाली पलैसिबो चिकित्सा प्रणाली न समझें, इसको अपनाओ और गम्भीर से गम्भीर बीमारी से मुक्ति पाओ। होम्योपैथी एक खजाना है जो अपने अन्दर बहुत कुछ करने की ताकत रखता है। आओ हम इस
खजाने को ढूंढें और अपनाएं।