Friday, February 18, 2011
अगरRIGHT SIMILIMUM दवा मिल जाती तो एक केस भी कहीं भी नही जाने वाला था।
•To remove mis-conceptions of homoeopathy.
•To provide maximum knowledge of homoeopathy & homoeopathic medicines to all .
•To provide a platform for discussion on homoeopathy.
•Invitation of feedbacks on my homoeopathic articles .
•Invite other homoeopathic doctors to give their suggestions .
•Provide homoeopathic knowledge to homoeopathic students .
•To invite students for their quaries, discussions & other homoeopathic related doubts.
•If somebody wants to know about homoeopathic treatment,they are most welcome.
•Patients who are suffered from different simple to chronic diseases & interested in homoeopathic treatment, are most welcome .
•To introduce about different homoeopathic activities
Monday, January 18, 2010
केस Report
केस नं0. 2
एक कुमारी लड़की क्लिनिक में लायी गयी। नाम रागिनीए उम्र 30 सालए बीण्एण्ए बहुत परेशान। दस से उसे मुत्र दूध की तरह हो रहा था। पटना.भागलपुर इलाज में तीस हजार खर्च कर चुकी थी। लाचार थीए परेशान थी। बोली सरए मुझे होमियोपैथी को जानकारी हैं मुझे आशा है इसी से मुझे लाभ होगा। मैं छोटे.छोटे रोग में होमियोपैथी दवा करा चुकी हूँ। इससे बहुत लाभ होता है। Objective resonable & hopeful के आधार पर nm-30 की एक खुराक दिया pl के साथ। तेईस दिन पर आयी। बोलीए वह रोगमुक्त और बिल्कुल ठीक है।
Sunday, January 3, 2010
ग्रेट दिस्कोवेरी-होमिओपेथी
आईये, इसको ‘‘मियाज्म’’ के हिसाब से देखते है-
ज्यादातर अविष्कार मनुष्य के जीवन को आराम, आरामदेय और सुख-सुविधाओं के मददेनजर किये गये है, ये sycotic की उत्पति के कारण हुए है । कुछ ऐसे अविष्कार जो प्रकृति के खिलाफ काम करते है और ‘‘मनुष्य जीवन को नाश’’ करने वाले है, चाहे वह स्वयं का हो या दुसरो का, यही नही कोई ऐसा काम, जो किसी भी जीवन के लिए, जो कि पृथ्वी पर है, उसका ‘अनिष्ट’ करने वाला हो या अनिष्ट में सहयोग पहुँचाता है। ये syphilis के उत्पति के कारण होता है और खास तौर से syphilitic व्यक्तियों द्वारा ही अविष्कारित होते हैं, अगर इन व्यक्तियों में syphilitic Miasm मौजूद ना होता तो उनके द्वारा अविष्कार ही नही हो सकता था। और ऐसे अविष्कार जो मनुष्य के ‘‘स्वास्थ्य’’ मंे सुधार करते हो, या सुधार करने में सहायक हो psora की उत्पति के सूचक है और सही मायने में, यही अविष्कार, ‘‘महान अविष्कार’’ कहलाये जाने चाहिए । हमें तो ईश्वरीय स्वरूप में भी ‘‘मियाज्म’’ दिखता है ।
हिन्दू ‘‘धर्मग्रन्थों’’ में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वर्णन मिलता है । आये दिन, इन देवी देवताओं के पूजन समारोह हुआ करता है । हिन्दू धर्म ग्रन्थ के अनुसार श्री ब्रह्मा ‘‘पैदा करने वाले’’ है, श्री विष्णु, ‘‘पालन’’ करने वाले है और महेश यानि कि ‘‘शंकर भगवान’’ संहार करने वाले है । ‘मियाज्मी तौर पर ब्रह्मा ‘जनक’’ यानि कि सोरा, विष्णु ‘‘पालक’’ यानि की साइकोसिस और महेश ‘संहारक’’’ यानि कि सिफलिस ।
ठीक इसी तरह जब हम गहराई से समझते है तो पता चलता है, ‘‘मियाज्म’’ हमारे जीवन के साथ चलते रहता है ।
‘‘श्री वैष्णों देवी का भव्य, मंदिर जम्मू काश्मीर स्टेंट में है, जहाँ हर साल लाखों भक्त जाते है। जहाँ माता वैष्णो, तीन पिड़ियों के स्वरूप में विराजमान है । इन तीनों पिड़ियों में एक माँ सरस्वती, दुसरी माँ लक्ष्मी एवं तीसरी माँ काली की है और इन तीनों शक्तियों के मिले-जुले स्वरूप को माता वैष्णों के रूप में जानी जाती है, मगर इन्हें भी ‘‘मियाज्म’’ के अनुसार देखते है, तो माँ सरस्वती ‘‘सोरा’’ है माँ लक्ष्मी-सायकोसिस और माँ काली- सिफिलस
थोड़ा और आसान शब्दों में कहे तो माँ सरस्वती यानि की ‘‘विद्या’’ यानि की आवश्यकता ये ‘‘सोरा’’ है । माँ लक्ष्मी यानि कि ‘वैभव’ यानि कि ‘विश्वास’’ यानि कि सुख समृद्धि ये साइकोसिस के सूचक है और माँ काली यानि कि ‘संहारक’ यानि कि ‘नाशकर्ता’ सिफिलिस की सूचक है ।
आपको ये सभी बातें एक bouncer की तरह लग रही होगी, जो कि आपके दिमाग में फूट रही होगी । जी, हाँ यह सभी ज्ञान-एक वम्ब की तरह ही है अगर आप इसको अच्छी तरह समझ लें तो यह निश्चित है कि अगर ये समझ मे आ गया तो दुनिया छोटी दिखने लगेगी एवं चिकित्सा के क्षेत्र में जितने अविष्कार अब तक हुए, उन सबसे यह महान ‘अविष्कार’ होगी, आपके लिए ।
यह डा0 हैनिमैन का ही ‘‘सोच’’ था, एक आईडिया था, जिसने होमियोपैथी को इतनी उँचाई पर ले गया और इनके द्वारा ही डा0 बोनिनघसन, डा0 हेंरिंग, डा0 ऐलन, डा0 केन्ट और डा0 वोगर के पास गया । मैं निसंकोच कह सकता हूँ कि पुरी दुनिया में लाखो-करोड़ों होमियोपैथिक टीचर होगें, लेकिन बहुत कम ही होंगे, जिन्होंने उस तरह होमियोपैथी को समझा होगा जिस तरह डा0 हैनिमैन चाहते थे कि समझा जाये ।
यहाँ पर बहुत महान होमियो चिकित्सक है और कुछ तो बहुत अच्छे भेटेरिया मेडिका के शिक्षक भी है, यहाँ तक की होमियोपैथिक फिलास्फी एवं रेपर्टरी, उन्हें ‘‘जुबानी’’ तक याद है मगर डा0 हैनिमैन की सोच तक नही पहुँच पा रहे हैं क्योंकि ऐसी सोच ‘‘आम आदमी’’ के बस का ही नही है, इसके लिए हमें असाधारण परिश्रम करना ही पड़ेगा । इसके लिए हमें अपनी असफताओं से ‘सीखना’ चाहिए कि हम अपने केस में अगर फेल हुए तो क्यों हुए?
हमारी दवा चुनने में कहाँ कमी रह गयी? ‘‘अनुभव’’ द्वारा ही हम इसे जान पाते हैं क्योंकि ‘अनुभव’ ही हमारा सच्चा शिक्षक है जो कि कभी भी ‘गुमराह’ नही होने देता है और मनन करने पर बता देता है कि आप यहाँ पर गलत थे । चाहे हम किसी ‘‘मेथड’ द्वारा रोगियों के लिए दवा का चुनाव करें । परन्तु चाहिए सिर्फ ‘‘एक सिमिलियम रिमेडी’’ ही । पिछले दिनों ‘‘माइंड टेक ऐसोसियसन’ के क्लास में कुछ इसी तरह के अनुतरित प्रश्न डाक्टरों द्वारा पुछे गये थे । कलकता से आये, डा0 बी0 एन0 चक्रवर्ती ने बताया कि ‘होमियोपैथिक माइंड’ पढ़ कर, इनमें कई तरह के असाध्य रोगों में चिकित्सा करने का साहस पैदा हुआ, परन्तु जल्द ही वह ‘‘साहस’’ निराशा में बदल गया और उन्हें आज तक समझ नही आया कि ऐसा कैसे हों गया। उन्होंने बताया कि एक Acute Renal Failure का केस था, जिसमें उन्होंने well Similimum का चुनाव किया एवं Lycopodium का इस्तेमाल रोगी पर किया । अगले सप्ताह रोगी ने रिपोर्ट किया कि बहुत अच्छा है, सभी तकलीफों में ‘आराम’ है और मुझे होमियोपैथी एवं आप पर भरोसा हो गया है, कि अब मैं बच जाउँगा क्योंकि मेरा Serium- Creatinne & Blood Urea घट रहा है। नींद भी अच्छी आ रही है भुख लग रही है और मेरे खाने का रूचि बढ़ गयी है और कल से मैं अपने काम पर भी जा रहा हूँ।
मगर रोगी की यह खुशी ज्यादा दिन तक नहीं रह सकी क्योंकि फिर अचानक धीरे-धीरे रोगी का हालत में गिरावट शुरू हो गयी, जो वजन ‘दवा’ देने के बाद बढ़ रहा था वो घटने लगा, ब्लड प्रेसर भी हाई होने लग गया, कुछ-कुछ सूजन भी बढ़ने लगा। पहले जो Serium- Creatinne & Blood Urea घट गया था वो बढ़ने लगा Bun का लेवल भी बढ़ गया तथा साँस लेने में कठिनाई होने लगा । बार-बार Lycopodium देने के बाद भी सुधार नही हुआ । पोटेन्सी बदल-बदल कर दिया गया मगर जो फायदा पहली खुराक से हुआ था, वो फिर नहीं दिखाई पड़ा । दवा बदल कर भी देखा, मगर कोई फायदा नजर नहीं आया, लाख कोशिश के बाद भी, अन्ततः रोगी मर गया ।
ऐसा क्यों हुआ?
लखनउ से आये, डा0 समीर ने भी इसी तरह के एक रोगी के बारे में बताया कि यह रोगी I.H.D (इसिच्मीक हार्ट डीसिस) का था और काफी चिकित्सा के बाद भी इसे असाध्य मान कर ऐलोपैथो द्वारा मरने के लिए छोड़ दिया गया था, मेरे पास पहुँचा । मैंने काफी मेहनत करके उसके लिए Ars Alb का चुनाव किया एवं दवा दिया, अगले दिन ही सूचना मिली, काफी सुधार है । पाँच महिने तक उतरोतर सुधार होता रहा । रोगिणी जब भी दवा लेने आती थी तो कहती थी, डा0 साहब जब से आपके ईलाज में हूँ बहुत अच्छा महसूस कर रही हूँ। मगर अचानक एक दिन फोन आया कि डा0 साहब जल्दी आईये, रोगिणी की हालत बहुत खराब है । घर जा कर देखा, तो रोगिणी काफी सीरियस नजर आयी, बेहोशी के साथ सांस काफी दिक्कत से ले पा रही थी । आक्सीजन लगाया गया तथा फिर से Ars Alb का प्रयोग किया एवं शाम को खबर तो आयी, मगर पहले के खबर से अलग थी कि रोगिणी को अब किसी दवा की जरूरत ही नही है। शाम होने के पहले ही उसका इन्तकाल हो गया ।
ऐसा क्यों हुआ?
क्या होमियो चिकित्सा, टोना-टोटका की तरह है? या Similia Similibus का सूत्र एक ‘मजाक’ है? इसी तरह के प्रश्न उठते रहे।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या होमियोपेथिक दवाओं की भी कोई ‘सीमा’ है, जहाँ से आगे जा कर यह काम नही करता है?
क्या यह सिर्फ नयी बीमारियों में ही फायदेमंद है?
क्या यह गम्भीर रोगों में क्षणिक फायदा ही पहँचा सकता है?
अगर इन सारे प्रश्नों के जवाब हाँ है तो फिर डा0 हैनिमैन को होमियोपैथी के अविष्कार की जरूरत क्या थी?
क्यों आर्गेमन में पुरानी बीमारियों के चिकित्सा के ही विषय में लिखा गया है?
क्यों हम लोग अक्सर सुनते है कि ‘कैन्सर’ का रोगी होमियो ईलाज से ठीक हो गया ।
क्यों होमियोपैथी द्वारा चमत्कार होते है?
क्यों, ये चमत्कार कुछ रोगों में हो जाते है, सभी में नहीं?
क्या, ये चमत्कार गलती से हो जाते है?
सारे प्रश्नों का ‘‘सार तत्व’’ यह है कि क्यों ‘‘होमियोपैथ्स’’ फेल करते है?
वो कौन से कारण है, जिनके कारण ‘‘होमियोपैथ्स’’ फेल हो जाते है,
हम नित नई-नई दवाआंे के खोज में लगे है, मगर यह नही समझते है कि ‘सल्फर’ जैसी प्योर सोरिक रिमेडी से कैन्सर जैसी सिफिलिटिक रोग कैसे ठीक किया जाता है?
कलकता के डा0 बी0 एन0 चक्रवर्ती जी के किडनी केस में क्या हुआ ।
आइये विवेचना करे-
बीमारी की उत्पति के दौरान प्राथमिक लक्षण उत्पन्न होते है, जिन्हें ऐलोपैथिक दवाओं द्वारा खत्म कर दिया जाता है । ब्लड-प्रेशर एक बड़ा करण हो जाता है, ‘‘किडनी को फेल’’ करने का। अगर ब्लड - प्रेशर हो गया है, तो उसकी ‘‘कारण-चिकित्सा’’ होनी चाहिए, ना कि रूटिन तौर एक दवा, चाहे वो ऐलोपैथिक हो या होमियोपैथिक लगातार खाने रहने पर ‘‘किडनी फेल’ हो जायेगा, इसमें संदेश नही है । इस प्रक्रिया को शरीर क्रिया विज्ञान के आलोक में समझते है- जब ‘‘रेनल अर्टरी’ में छंततवू वाली स्थिति बन जाती है तब खून की सप्लाई किडनी में कम होने लगती है । जब कि किडनी को प्रयाप्त आपूर्ति चाहिए, पर उपरोक्त कारण के वजह से यह सम्भव नही हो पाता है, जिसके कारण शरीर दुसरी तरफ इसकी आपूर्ति की व्यवस्था में लग जाता है और हार्ट पर प्र्रेसर बनाने लगता है कि तुम, अत्याधिक दबाव के साथ खून का संचालन करो ताकि अधिक जोर से खून, झटका देते हुए बढ़े एवं अर्टरी में जो छंततवूमक स्थिति सुधर जाये और किडनी को प्रयाप्त खून मिलने लगे ताकि शरीर पूर्ण रूप से अपना काम करें ।
मगर यहाँ पर कारण चिकित्सा ना करके ब्लड प्रेसर कम करने की दवा चलानी शुरू हो गयी । एण्टी हाइपरटेन्सिव ड्रग ने, चाहे वो होमियोपैथिक हो या ऐलोपैथिक ब्लड प्रेसर को तो कम किया, जिसे आम भाषा में कहा जाता है कि इस दवा से मेरा ब्लड प्रसर कन्ट्रोल हो गया पर किडनी को तो ब्लड की आपूर्ति पुरी मात्रा में तो नही हो रही और धीरे-धीरे और कम सप्लाई होती जायेगी, जिसके कारण किडनी का बचना तो असम्भव ही है यानि कि किडनी फेल हो गयी । क्योंकि किडनी के परेन्चाईमा धीरे-धीरे नष्ट हो रही थी, और यह ब्लड-पे्रसर के कारण नही हुआ बल्कि किडनी में खून की आपूर्ति कम मात्रा में होने के कारण हुआ और यहाँ पर ऐलोपैथिक डाक्टर एक ही सलाह देते है कि अब बिना ‘‘डायलिसिस’’ किये कोई उपाय नही है । डा0 बी0 एन चक्रवर्ती की Lycopodium ने भी ‘‘डायलिसिस’’ का ही काम किया, जिसके कारण रोगी में उतरोतर सुधार होता गया, स्थिति रोज-व-रोज अच्छी दिखाई पड़ने लगी, मगर ‘‘रोग की कारण-चिकित्सा’’ यहाँ भी ना की गयी और रोग धीरे-धीरे sycotic से प्रोग्रेस कर syphilitic में चला गया तब रोगी की हालत खराब होने लगी, अगर इस समय भी रोगी की ‘‘कारण सहित सम्पूर्ण चिकित्सा’’ की जाती तो शायद रोगी आज जीवित होता परन्तु Perfect similimum Remedy रिमेडी तक नही पहुँच पाने के कारण, रोगी मर गया । डा0 हैनिमैन ने अपनी पुस्तक chronic Diseases और आर्गेनन के सूत्र नं0- 205 में लिखा है कि अगर होमियोपैथिक चिकित्सक किसी रोगी में प्राईमरी लक्षणों को नही पाता है, यदि पहले से ही नष्ट हो गये हो तो उसको अब deal with secandory ones की तरह सोचना चाहिए और पता लगाना चाहिए कि इन लक्षणों के पहले कौन से लक्षण उत्पन्न हुए थे यानि कि अगर यह रोगी sycotic state में आया है, तो psora क्या था ? इसका साफ-साफ मतलब है कि chronic diseases or Terminal Cases or Grave Pathological Diseases की चिकित्सा करने के पहले आपको सम्पूर्ण रोगी इतिहास को इस्तेमाल करना पड़ेगा। शायद इसी लिए डा0 हैनिमैन ने लिखा है कि
Cannot be treated with out the Underlying" "Miasm" being taken in to consideration."
जब भी हमलोग होमियोपैथिक दवा का चुनाव करते है, सिर्फ यह नही सोचना है कि लक्षणों से सादृश्य दवा लेना है या क्पेमंेम से सादृश्य दवा चुनना है बल्कि रोगी के इतिहास से भी सादृश्य दवा चुनना है ।
Wednesday, November 11, 2009
Thematic Mind Repertory
Delusions; voices, hears, abdomen, are in his: thuj 2058
Dreams; body, abdomen, cut, a big cut in: ozone 227
Dreams; body, abdomen, cut, a big cut in, blood and pus, under which amounts of: ozone 227
Dreams; body, abdomen, cut, a big cut in, tumor, under which grows a: ozone 227
Dreams; body, abdomen, painful: apis 36, choc 222
Dreams; body, abdomen, covered with warts and ulcers: choc 222, junc 36
Dreams; body, abdomen, wind-colic: fago 36
Fear; abdomen, arising from: asaf.
Thoughts; abdomen, as if from : thuj 5
NIT-AC:Al,30- Anxious oppression, like nightmare, as if some one were lying under him and holding him fast with the arms about his abdomen, so that he could not free himself, immediately after falling asleep. (constriction, immobilization)
Abortion
see: Blood, Death, Disease, Fit, Fragile
Anguish; abortion, in threatening: cham 54
Delusions; womb is soft and feeble and would cause abortion: abies-c 85
Dreams; abortion: ign 36, m-arct 5
Dreams; abortion, efforts and plans: ign 36
Fear; abortion, in threatening: bell 26, cimic 54, kali-c 26, op 54, sabin 54
Fear; death, abortion, abort, is sure she will: nux-m 26
Fear; death, abortion, die from hemorrhage, is sure she will: acon 26
Fear; death, abortion, in: acon 26, apis 26, coff 54, gels 26, kali-c 26, nux-m 26, sec 26, stram 26
Suicidal disposition; abortion, in threatening: aur 26
Talk; indisposed, abortion, in threatening: nit-ac 26
ACON:He,51- Ailments from fright: afraid (fear) in dark; vertigo; faintness; trembling; cardiac weakness; threatened miscarriage (abortion); impending cessation of menstrual flow;..
GELS:He,30- Bad effects (ailments) from suddenly hearing bad news; from fright(fear); diarrhea, abortion etc.
Abroad
see: Distances, Fly, Home, Homesickness, Liberty, Nostalgia, Stranger, Travel
Confusion of mind; country, as if now in one, now in another: chlol 36
Delirium; loquacious, foreign countries, of : cann-i 2058
Delusions; abroad, being: verat 30
Delusions; man, talking in foreign languages : stram
Homoeopathy: False or Truth
होम्योपैथी एक उत्तम चिकित्सा प्रणाली है जिस में उन बिमारियों का भी इलाज किया जा सकता है जो आध्ुनिक मैडीकल साईंस करने में असमर्थ रहती है। जरुरत है कि मरीज अपनी बीमारी को पूरी तरह ब्यान करे और डाक्टर अच्छी तरह जांच पड़ताल करके उसके लिए एक दवाई का चुनाव करे जो उसके मानसिक लक्षणों को भी महत्ता दे। होम्योपैथी प्रणाली के बारे काफी गल्त धरणाएं प्रचलित हैं। आज उन अलग अलग धरणाओं पर विचार करेंगे और क्या सच्चाई है, यह जानने की कोशिश करेंगे।
1. सब से पहली धरणा तो यह है कि होम्योपैथी धीरे-ध्ीरे असर करती है। अक्सर मरीज कहते हैं कि हम होम्योपैथी इस लिए नहीं लेते क्योंकि इस का असर बहुत देर बार होता है।
सच्चाई: यह धरणा बिल्कुल गलत है। यदि मरीज Acute [rqjar] अभी हुई बीमारी से पीड़ित होकर आया है तो एक ही पुड़ी उस को रोग मुक्त कर सकती है। बुखार, खांसी, फोड़े फिंसीयों के केसों में हम बहुत बार देखते हैं कि सिर्फ एक ही दवाई 2-3 दिन खाने से मरीज ठीक हो जाता है। पर यदि हमारे पास मरीज ही अपनी बीमारी की आखरी सटेज पर आता है ;जो कि अक्सर देखने में आता हैद्ध और होम्योपैथी को सिर्फ परखने की कोशिश करता है कि बाकी दवाईयां तो बहुत खा ली हैं, चलो होम्योपैथी भी लेकर देख लें, तो यह कैसे सोचा जा सकता है कि इतने वर्ष तो बाकी दवाईयां खा-खा कर शरीर में उन दवाईयों ने घर कर लिया और अब होम्योपैथी की एक पुड़ी जादू दिखा दे। यदि बीमारी पुरानी है तो कुछ समय देना पड़ेगा, होम्योपैथी के ईलाज के लिए। पर इस में भी हमने देखा है कि पुरानी बीमारियों में भी कई बार तुरंत आराम मिल जाता है।
2. होम्योपैथी को एक ऐसी चिकित्सा प्रणाली माना जाता है जिस में सिर्फ पुरानी और लम्बे समय से चली आ रही बीमारियों का इलाज किया जाता है।
सच्चाई: यह धरणा बिल्कुल गलत है। इस में हरेक बीमारी यदि वह नई हो ;भाव थोड़े समय से उत्पन्न हुई होद्ध या पुरानी हो, दोनों का ही ईलाज सम्भव है। बल्कि जितनी बीमारी पुरानी होती है, उस का ईलाज उतना लम्बा हो सकता है और जितनी नई उतना ईलाज भी आसान होता है और मरीज कुछ दिनों में ही ठीक हो जाता है।
3. होम्योपैथी के बारे में यह धरणा प्रचलित है कि यह सिर्फ मीठी-मीठी छोटी गोलियां हैं जो छोटे मोटे रोग बुखार, जुखाम, खांसी आदि ही ठीक कर सकती हैं। सच्चाई: यह धरणा भी बिल्कुल गलत है। कौन कहता है कि बड़ी बीमारियों का ईलाज होम्योपैथी में नहीं है। यदि हम आज इंटरनैट पर ढूंढें तो बहुत डाक्टरों ने उन बीमारियों के ईलाज करके अपनी वैबसाईट पर केस डाले हुए हैं जिन के बारे मार्डन साईंस के पास कोई ईलाज नहीं है। आओ अपनी सोच को आगे बढ़ाएं, बात दरअसल यह है कि हम यह सोच नहीं सकते कि होम्योपैथी दिल, जिगर और गुर्दों आदि के भयानक रोग भी ठीक कर सकती है। फर्क हमारी सोच का है। कमी सिसटम में नहीं, हमारी सोच में है। यदि किसी बीमारी के ईलाज मार्डन साईंस के पास नहीं तो होम्योपैथी को अपनाओ। एक बढ़िया तरीके से ईलाज करवाओ, इस को परखो मत। पूरे विश्वास से दवाई लो।
4. कई मरीज यह समझते हैं कि वह होम्योपैथी इस लिए नहीं लेते क्यों इस में खाने-पीने पर बहुत बंदिशें लग जाती हैं।
सच्चाई: यह धरणा भी बिल्कुल गलत है। बहुत नई-नई खोजें हो रही हैं। जब हम मानसिक लक्षण लेकर मरीज को दवाई देते हैं तो हम कभी भी कोई भी प्रहेज नहीं बताते। देखना सिर्फ यह होता है कि अगर मरीज किसी खास वस्तु से अलर्जी है या किसी खास चीज के प्रति संवेदनशील है तो वह मरीज उस वस्तु को न ले। यह बिलकुल गलत है कि हरेक मरीज प्याज, लहसन, सौंफ, कौफी या ज्यादा तेज पदार्थ न ले। सिर्फ वह वस्तु बंद की जाती है जिस के लिए मरीज संवेदनशील है या जिस चीज से उसको अलर्जी होती है या जिस चीज से मरीज की तकलीफ बढ़ती है जैसे शूगर के मरीजों के मीठी चीजों का प्रहेज करना। मैंने तो अपने 25 वर्षाें के तजुर्बे में यही देखा है कि जब दवाई का चुनाव सही होता है तो वह हर हालत में असर करती ही करती है। यहां एक बात ओर महत्वपूर्ण बताने योग्य है कि जिस चीज से कोई दवाई बनी होती है, उस दवाई के सेवन में वह चीज भौतिक रुप में लेनी बंद की जाती है। जैसे यदि कोई प्याज या लहसन से या हिंग से बनी है तो उसी खास दवाई से वह चीज बंद की जाती है क्योंकि जब होम्योपैथी दवाई बनाई जाती हैं तो इन में मूल तत्व के बहुत कम या नामातर ही अंश रह जाते हैं। इसी लिए यह पोटैंटईज होती हैं और Dynamic रुप में असर करती मानी जाती हैं।
5. माना जाता है कि होम्योपैथी में ईलाज बहुत लम्बा होता
: यह धरणा बिलकुल गलत है। पहले पहरे में विस्तार पूर्वक बताया जा चुका है कि ईलाज लम्बा नहीं होता। यदि थोड़े समय की बीमारी है तो इस को कम समय लगेगा और यदि मरीज सब तरफ से दवाई खाकर थक कर आया है तो उस का ईलाज लम्बा हो सकता है। यहां यह बात बतानी बहुत महत्वपुर्ण है कि हम अंग्रेजी दवाई तो सारी उम्र खाते रहते हैं, वहां ईलाज लम्बा नहीं लगता और यदि होम्योपैथी कुछ महीने खानी पड़ जाए, जहां ईलाज में मरीज का बीमारी से मुक्त होना सम्भव है, वह मुश्किल लगती है। बड़ी हैरानी और दुख होता है जब आम लोगों में यह धरणा पाई जाती है कि होम्योपैथी को पूरी तरह समझते नहीं।
6. अक्सर मरीज सोचते हैं कि यदि हम होम्योपैथी ईलाज शुरु करेंगे तो अंग्रेजी दवाईयां बंद करनी पड़ेंगी।
सच्चाई: यह धरणा भी गलत है। कई होम्योपैथी डाक्टर भी ऐसे हैं जो मरीज की अंग्रेजी दवाई जो वह कई वर्षों से खा रहा है, एक दम बंद कर देते हैं। बल्ड प्रैश्र, शूगर, थइराइड, मिरगी और कई ऐसी बीमारियां हैं, जिनकी दवाई तुरंत बंद नहीं की जा सकती। यदि हम यह दवाई एक दम बंद कर देंगे तो मरीज का शरीर जो इन दवाईयों से ठीक रहता है, एक दम इन बीमारियों को उभार देगा जो कि मरीज के लिए भी खतरनाक है और होम्योपैथी सिस्टम के लिए भी। पहले एक सही होम्योपैथिक दवाई का चुनाव करो, जब आपको लगे कि मरीज का बल्ड प्रैश्र या शूगर या और बीमारियां थोड़ा ठीक होने की तरफ जा रही हैं तो अंग्रेजी दवाई को कम करके बंद करो। एक ही दिन सब कुछ बंद नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से मरीज ध्ीरे ध्ीरे होम्योपैथी को अपनाने लगेगा। उसका शरीर होम्योपैथी को अपनाने लग जाएगा और दूसरी दवाईयों को छोड़ना उसके लिए आसान हो जाएगा। एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि कोई भी अंग्रेजी दवाई, होम्योपैथी के साथ ली जा सकती है। यह नहीं होता कि अब अंग्रेजी दवाई ली है और होम्योपैथी का असर खत्म हो गया। अंग्रेजी दवाईयां भौतिक स्तर पर काम करती हैं जिनका असर कुछ समय के लिए ही होता है, होम्योपैथी दवाईयां कलदंउपब रुप में काम करती हैं, जिनका असर कई कई हफते, महीने और वर्षों रहता है।
7. अकसर लोगों को यह कहते सुना है कि होम्योपैथी में टैस्टों की कोई जरुरत नहीं।
सच्चाई: यह धरणा बिलकुल गलत है। जी नहीं, हमें भी टैस्टों की उतनी ही जरुरत है जितनी कि मार्डन साइंस को। मान लो किसी मरीज के शरीर के किसी हिस्से में कोई रसौली या पत्थरी है या उस का बल्ड प्रैश्र बढ़ता है या उसकी शूगर बढ़ती है, यदि उसका हमें माप या साईज पता नहीं होगा तो हम यह कैसे बता सकेंगे कि क्या उसका ईलाज होम्योपैथी में सम्भव है या नहीं या उसके ईलाज को कितना समय लग सकता है या क्या आपरेशन ही इसका एक ही इलाज है या मरीज की हालत बहुत गम्भीर है और उसकी जिन्दगी का प्रश्न है। टैस्ट करवाने से हमें मरीज की बीमारी की तीबरता का पता लगता है। हमें बीमारी के नाम के बारे जानने की इतनी जरुरत नहीं होती परन्तु वह बीमारी कितनी बढ़ चुकी है, यह जानने के लिए टैस्ट करवाने बहुत जरुरी हैं।
8. एक और धरणा कि होम्योपैथी पहले बीमारी को बाहर निकालती है और फिर ठीक करती है।
सच्चाई: यह धरणा भी गलत है। होम्योपैथी में बीमारी का बढ़ना एक अच्छा लक्षण माना जाता है पर कितना बढ़ जाना, ऐसे न हो कि मरीज का बुरा हाल ही हो जाए। यदि मरीज की बीमारी बढ़ती भी है पर उसको अंदरुनी मानसिक तौर पर उसकी पीड़ा कम होनी चाहिए। यह माना जाता है कि हमारे शरीर के अन्दर कुछ जहरीला मादा धीरे ध्ीरे जमा होता जाता है जो बढ़ बढ़ कर एक बीमारी का रुप धरण कर जाता है। जब एक सही दवाई का चुनाव होता है तो यह गन्दा मादा [expulsions] के रुप में बाहर निकलना शुरु हो जाता है। मरीज को शौच, उल्टियां, जुकाम, रेशा, गुस्सा बढ़ जाना आदि किसी भी बाहरमुखी द्वार के द्वारा यह मादा बाहर निकलना शुरु हो जाता है। यह कुछ दिनों बाद ठीक हो जाता है पर इन दिनों में मरीज मानसिक रुप में पहले से अच्छा महसूस करता है। यदि मरीज की बीमारी बहुत बढ़ जाती है तो इसका यह भी मतलब है कि दवाई का चुनाव सही नहीं हुआ या दवाई का बीमारी पर असर नहीं हुआ या एक और लक्षण भी हो सकता है कि दवाई की ताकत बहुत हल्की या ज्यादा दी गई।
9. एक बहुत ही महत्वपूर्ण गलत धरण है कि होम्योपैथी में सटीराईड [steroids] इस्तेमाल किया जाता
: यह धरणा तो बिलकुल गलत है। पहली बात तो यह है कि होम्योपैथी में कोई भी सटीराईड नहीं होते। दूसरी बात यह कि मरीज तो हमारे पास पहले से ही इतनी ताकतवरAntibiotics और steroids खाकर आए होते हैं और हम उनको सटीराईड क्या दें। यहां साथ ही मैं एक चेतावनी भी देना चाहती हूं कि जो डाक्टर कई कई दवाईयां मिला कर, पीस कर बड़ी बड़ी पुड़ियां बना कर देते है, उनसे सावधन रहें।
10. यह धरणा कि होम्योपैथी सिर्फ छोटी छोटी मीठी गोलियों की चिकितसा प्रणाली है जिस को लोगों ने पलैसीबो थिरैपी का नाम भी दिया है क्योंकि वैज्ञानिकों ने किसी भी दवाई की 12ब् या 24ग ताकत के बाद दवाई के भौतिक तत्व नहीं ढूंढते।
सच्चाई: यह धरणा बिलकुल गलत है कि यह एक पलैसिबो थिरैपी है। पर साथ ही यह भी एक सच्चाई है कि वैज्ञानिकों को किसी भी दवाई की 12c या 24x ताकत के बाद दवाई के भौतिक तत्व नहीं मिलते। दुनियां भर के सब होम्योपैथिक डाक्टरों का मानना है कि जैसे जैसे दवाई की ताकत बढ़ती है, चाहे उस में भौतिक तत्व और कम हो जाते हैं, पर उस की मरीज को ठीक करने की ताकत और बढ़ जाती है। यह एक बार नहीं, सौ बार भी नहीं, हजार बार नहीं, बल्कि लाखों करोड़ों बार बार-बार अजमाया जा चुका है। यदि यह पलैसिबों थिरैपी होती तो इस का असर छोटे बच्चों और जानवरों पर कैसे होता? रसौलियां, पत्थरियां, भौरियां पर कैसे होता? होम्योपैथी जानवरों के केसों पर बहुत लाभदायक सि( हुई है। शायद अभी वैज्ञानिक इतनी ज्यादा खोज करने में असमर्थ हैं, पर आने वाले समय में इन धरणाओं द्वारा ही प्रमाणित किया जाएगा। उस समय इस प्रणाली को पलैसिबो थिरैपी नहीं माना जाएगा बल्कि मार्डन सिस्टम के बराबर माना जाएगा।
11. एक और धरणा कि होम्योपैथी के गलत असर [side effect] नहीं होते।
सच्चाई: यह धरणा भी गलत है। कौन कहता है कि कोई भी चीज जो हमारे शरीर के अंदर जाती है, कोई भी असर नहीं करती। यह क्यों माना जाता है इस के गलत असर नहीं होते। क्यों आज तक यह उन लोगों के हाथों में रही, जिन्होंने सिर्फ इसको शौंक के तौर पर अपनाया। अकसर देखा गया है कि होम्योपैथी को लोगों ने एक काम के तौर पर नहीं बल्कि लोगों की सेवा और मनोरंजन के लिए अपनाया। कुछ किताबें पढ़ीं और 2-4 शीशी दे दीं। चाहे इस का असर सीध्े तौर पर गलत असर कम होता है पर डा. हैनीमैन के समय से यह किताबों में लिखा हुआ है कि यदि यह दवाईयां बिना किसी बीमारी के हर रोज ली जाएं तो कुछ समय बाद यह उस इनसान के अन्दर अपने लक्षण पैदा कर देती हैं। मनुष्य के शरीर में जो दवाई बार बार, बिना डाक्टर की सलाह से ली जाए, उस का कोई न कोई गलत असर जरुर हो सकता है। आज के समय में हमारे डाक्टर एम.डी. की डिगरी कर रहे हैं, और बड़ी योग्यताएं प्राप्त कर रहे हैं और साथ में यह भी प्रचार करते हैं कि दवाई का इस्तेमाल हल्की मात्रा के अनुसार ही करना चाहिए। पूरे पंजाब में क्या, पूरे देश भर में यह लहर चल रही है कि एक ही सही दवाई का चुनाव करो और उसको हल्की मात्रा में दो ताकि बाद में कोई भी गम्भीर प्रणाम न भुगतना पड़े।
मेरा यह लेख लिखने का उद्देश्य पाठकों के मनों में होम्योपैथी से जुड़े भ्रम दूर करना था और मैं उम्मीद करतa हूं कि मेरा यह सन्देश आम जन साधरण तक जरुर पहुंचेगा और होम्योपैथी को और आगे लेकर जाएगा। होम्योपैथी को छोटी मीठी गोलियों वाली पलैसिबो चिकित्सा प्रणाली न समझें, इसको अपनाओ और गम्भीर से गम्भीर बीमारी से मुक्ति पाओ। होम्योपैथी एक खजाना है जो अपने अन्दर बहुत कुछ करने की ताकत रखता है। आओ हम इस खजाने को ढूंढें और अपनाएं।
Friday, October 9, 2009
टी0वी0 एक खुराक में ठीक
टी0वी0 एक खुराक में ठीक एक रोगी जिसे दिन के समय बुखार आता था और दिनों-दिन जिसका वजन गिर रहा था, एक मेरे पुराने रोगी का रिश्तेदार था, जिससे मिलने के बाद रोगी ने कहा कि देखिए ना, मुझे लगता है कि किसी ने मेरे पर जादू कर दिया है, एक दिन किसी ने मेरे घर में ताबीज पफेंक भी दिया और उसी दिन से मेरा शरीर गल रहा है । तब मेरे पुराने रोगी ने कहा कि आप मेरे साथ मेरे डाक्टर साहब के पास चलिए वो ठीक कर देंगे । उक्त वक्तव्य के साथ रोगी अपने रिश्तेदार के साथ क्लिनिक में आते ही बताये । मैंने रोगी को चेक किया एवं Anti-tubercular test लिख दिया और रोगी को Stramonium-30/1 एक खुराक खिला दिया । अगली बार रोगी Test Report लेकर आया, जिसको देखने के बाद पता चला किReport-Positive था यानि रोगी को Tubercularsis हो चूँका था । मैंने रोगी से पूछा-क्या हाल है रोगी ने कहा-डाúसाहब, आपकी एक खुराक दवा ने कमाल कर दिया है, अब मैं अच्छा महसूस कर रहा हूँ और डाक्टर साहब मैंने अपना वजन भी चेक किया हूँ-1) किलो वजन भी बढ़ गया है । मैंने रोगी से कहा-बहुत अच्छा है, पहले वाली दवा लगातार समय से खाते रहिए । रोगी बीच-बीच में 3-4 बार आकर ठीक होने की रिपोर्ट देता है और SL के साथ Continue करते रहा । एक महीने के बाद पिफर Anti-Tubercular test कराने को बोला, रोगी जब रिपोर्ट लेकर आया तो रिपोर्ट देखकर मैं दंग रह गया क्योंकि रिपोर्ट Nigative था ।Tuberculosis जैसे रोग में इतनी जल्दी रोग मुक्त होना, इसे होमियोपैथी की अद्भूत उपलब्ध् िनहीं तो और क्या कहेंगे ? इस केस में निम्न रूबरिक लिये गये थे ।
1. Delusion-injured, about to recieve is
2. Fear, injured of being
3. Superstitious
4. Delusion, House, surrounded, house is.
Friday, October 2, 2009
शरीर और होमियोपैथी
वो जो कम से कम दवा लिखते हैं वो BEST HOMOEOPATH है । यह एक GOLDEN RULE है । कोई जो कि सपफल होमियोपैथिक चिकित्सक बनना चाहता है, उन्हें अनावश्यक दवाओं को देने से बचना चाहिए । ऐसी जगह पर हमें सोचना चाहिए कि ‘‘कब दवा दें’’ और ‘कब’ ना दें । होमियोपैथी में हजारों किताबें मेटेरिया-मेडिका के रूप में हैं, यहाँ तक कि आर्गेनन और पिफलास्पफी, जो हमें दवा PRESCRIBE करने के लिए ‘‘गाईड’’ करते हैं । यह नहीं बता पाते कि कब ‘‘दवा’’ देनी चाहिए । केश नं0-1 एक रोगी अतिसार से पीड़ित हो मेरे पास आया, और बोला कि डाक्टर साहब, आज तीसरा दिन है मै मतैं इसकों भुगत रहा हूँ । दो दिन से यही हाल है, रोज लगभग 25-30 पखाने हो रहें है , बिल्कुल पानी की तरह एवं कभी हज्के पीले । और कुछ खाँउफ, तब तो जरूर जान पड़ता है अगर थोड़ा देर भी हो जाये तो पखाना मेेरे रोकने से नही रूकने वाला है। जब रोगी से पूछा गया कि-तुम परसो ही क्यों नही आ गये ? तो जवाब मिला कि एक तो ना मुझे कही जाने की शक्ति थी और ना ही पखाना मेरे CONTROL में था कि आपके पास 2 घंटा इंतजार करता । तब आज कैसे आ गये-मेरा अगला प्रश्न था । वह बोला-आज मैने ना कुछ खाया और ना कुछ पीया है, इसीलिए पखाना नही लगा है। दो दिन तक बहुत कमजोरी थी, कल से पखाने की बारम्बारता में कमी भी आई है और आज सुबह से कुछ खाने की ईच्छा भी बनी है एवं आज सिपर्फ 3 ही पखाने हुए है । रात को अच्छी नींद के कारण मुझ में चलने की शक्ति भी आई है, इसी वजह से आज आया हूँ। नया सवाल मैने रोगी से पूछा कि क्या तुम्हे सचमुच भूख लग रही है या जबरदस्ती तुम खुद कुछ खाना चाहते हो । नहीं-नहीं, आज सचमुच में 3 दिन के बाद मैने नास्ता किया है । उपरोक्त केस में, अतिसार निश्चित रूप से कुछ IN FACTION के कारण या TOXIN आ जाने के कारण [खाने के साथ या अन्य तरीके से] । अब हुआ यह कि शरीर ने उसको अपने स्तर निष्क्रिय करना चाहा, मगर वह निष्क्रिय नही हुआ, और शरीर उसको सह भी नही पा रहा है, यह चीज अगर शरीर में रहेगा तो शरीर को नुकसान पहुँचा सकता है, तब शरीर अपनी सुरक्षा के मद्देनजर, उस TOXIN को बाहर फेकना शुरू करता है, जो कि हमारे सामने अतिसार के रूप में आया । सत्य यह है कि अतिसार जो पैदा हुआ वह शरीर की अपनी सुरक्षा के कारण हुआ, तभी जाकर शरीर स्वंय ही CURE हो सका । यह CURE तभी आया जब शरीर से TOXIN बाहर निकल गया और उसकी जगह CURE पहुँच गया अेर तब अपने आप ही रोगी अच्छा लगने लगा, कमजोरी कम हुई, अच्छी नींद आयी, पखाना कम जो गया और उसमें शक्ति का संचार हो गया और उसकी भूख भी वापस हो गयी। सामान्यतः स्वास्थ्य का यही मापदंड है कि काम करने की ईच्छा जगे, काम करने की शक्ति आ जाये खाना खाने की स्वतः ईच्छा हो ना कि जबरदस्ती और इन सभी से ज्यादा महत्वपूर्ण है नींद का आना । अगर यह सभी कुछ हो रहा हो तो अब यह कहने कि जरूरत ही नही कि पखाना रूक जायेगा। नही-नही ‘‘पखाना रूक जाना’’ यहाँ सही शब्द नही हे बल्कि यह कहना ठीक होगा कि अब 24 घंटो के अन्दर पखाना सामान्य हो जायेगा । अब इस रोगी को सिपर्फ PL देकर कहना होगा कि जाओ, तुम्हारा पखाना कल से सामान्य हो जायेगा । आपकी भविष्यवाणी सच हो सकती है, अगर आप PHYSIOLOGY OF MAN को ठीक से समझते है, तो । आपके रोगी के अन्दर भी एक डाॅक्टर है, उसको भी आपको सम्मान देना होगा। अगर वह रोगी को CURE की पथ पर ले जा रहा है, तो किसी को भी हक नही है, उसमें व्यवधन डालने का , चाहे वह होमियोपैथ हो अथवा एलोपैथ । क्योंकि वह जानता है कि शरीर के लिए उत्तम क्या है ? केस न0-2 एक बच्चे को 4 दिन से बुखार था, जिसे मेरे पास ईलाज के लिए लाया गया । बच्चा सुस्त था, रात को बुरी तरह खांसी आती थी, साथ ही थोड़ा-थोड़ा पानी की प्यास । जब इस बच्चे को होमियोपैथी एवं ऐलोपैथी से ईलाज के पहले लाया जाता तो आप कौन सी दवा देते उसे, लेकिन उसेे इसी स्थिति में दवा की जरूरत है? सबसे पहले यह जानना होगा कि बुखार पिछले 3 दिनों में कभी उतरा था या नही ? दुसरी बात का पता लगायेगें कि क्या इसके क्रियाशीलता में कोई कमी आयी है या नही ? तीसरी बात - क्या बच्चा कुछ खाने के लिए माँग कर रहा है या नहीं ? अगर हाँ तो बच्चा निश्चित रूप से CURE की दिशा में अग्रसर हो गया है । अगर बच्चा कल की अपेक्षा आज खेल रहा है और खाने के लिए मांग कर रहा है, तो इसका सापफ मतलब है कि बच्चा अपने-आप स्वस्थ हो रहा है ;अगर अभी बुखार है भी तोद्ध अगर इस स्थिति में ऐलोपैथ को बुलाकर VIRAL INFECTION के लिए कोई दवा दी जा रही है तो यह अपराध् है । इस स्थिति में कोई भी दवा की जायेगी तो बच्चे कोेे बुखार के साथ नई बीमारी शुरू हो जायेगी और RECOVERY दूर चली जायेगी । हमें व्यक्ति के INTERNAL CURATIVE MECHANISM का सम्मान करना चाहिए। SINGLE REMEDY SINGLE DOSE अगर आप चाहते है कि आपकी चिकित्सा से चमत्कार हो, अगर इसे स्वंय अपनी आँखो के सामने देखना चाहते है, अगर आप टायपफाइड बुखार को 24 घंटे में खत्म करना चाहते हैं, अगर निमोनिया को 48-72 घंटो में ठीक करना चाहते हो, [RADIOLOGICALLY], अगर पेशाव के 100-135 पस-सेल्स को 48 घंटो के भीतर गायब देखना चाहते हो, या अगर अपनी चिकित्सा से एलोपैथों को आश्चर्यचकित कर देना चाहते हो, तो इसका सिपर्फ और सिपर्फ एक ही रास्ता है- ‘‘सदृश औषध् िकी एक मात्रा’’ वो चिकित्सक जो बुखार के कई दवाओं के मिश्रण, पेटेन्ट और वायो कम्बीनेशन देते है, या अतिसार के लिए एलो, पोडो, क्रोटोन टिग0 वो होमियोपैथिक सिद्धान्त या सिमिलिया, सीमिलिवस, क्यूरेन्टर के अनुसार चिकित्सा नहीं है अब उन्हे एक सच्चा प्रयास के लिए अग्रसर होना चाहिए और होमियोपैथी के प्रति न्याय करना चाहिए । एक रोगी को 3 बजे सुबह जाड़ा लगकर 4 बजे बुखार हो गया, इसके साथ ही ठंडे पानी की प्यास भी जाड़ा लगने के साथ ही है, पिफर जाड़ा बन्द हो गया, बुखार भी गायब हो गया, परन्तु भयंकर सिरदर्द शुरू हो गया, रोगी सुस्त हो गया, एवं नींद खत्म हो गयी । पंखा चाहता है, परन्तु किसी हड्डी में दर्द नही और ना ही शरीर में कोई शिकायत भी नही करता । अब इस केस को ANALYSIS एवं REPERTORISE करते है ।
1. CHILL AT 3 AM : NIGHT MID NIGHT AFTER 3 HOURS ON WALKING - ONLY FERR.
2. CHILL, NIGHT, MID NIGHTAFTER: ARS,CALAD, HEP, OP, THUJA, COFF, DROS, MAG-S, MANG, MERC, MEZ, PETR, SIL, SUL.
3.CHILL [CHAPTER] - TIME 3 HOURS- ALOE, AM-M, CAUST, CEDRON, CINNI, CINA, EUP PERF, FERR, LYSS, N-MUR, RHUS TOX, SIL, YHIYA
4. SOME RUBRICS - 3AM : ARS [COMPLETE REP.] 3-5 AM - KALI CARB [COMPLETE -REP.]
5. FEVER[CHAPTER]: SUCCESSION OF STAGE CHILL FOLLOWED BY HEAT - 78 DRUGS
अब आप स्वंय देख रहें है, इन रूबरिक देखकर ही मन भ्रमित हो जा रहा है, अब आप अपने रोगी को कौन सी दवा देंगे और क्या ठीक करेंगे? अन्य जो छोटे RUBRICS इसके साथ दिखेंगे वो है, पसीना के साथ वृ(ि, जाड़ा के पहले गर्मी लगना, पसीना के बाद प्यास, वगैरह-वगैरह, ये तो हमें और CONFUSE कर दे रहें है । अलग-अलग रेपर्टरी के अलग VERSIONS में भिन्न-भिन्न दवाएँ नजर आती है । अब बेचारा होमियोपैथ क्या करे? पिफर वो सबको छोड़कर 2, 4 या 6 दवाओं का समिश्रण तैयार करता है । जिन दवाओं में मुख्य रूप से ठण्ड, गर्मी, प्यास होती है इनको 2 - 2घंटे पर देने का आदेश देता है, पिफर ध्ीरे-ध्ीरे रोगो की तकलीपफ 3-4 दिनों में कम जो जाती है और होमियोपैथ खुश हो जाता है कि उसकी दवा ने बुखार ठीक कर दिया और उसने रोगी को ऐलोपैथ के पास जाने से बचा लिया । यह होमियोपैथ जान ही नही पाता है कि मिश्रण ने VIRAL या BACTERIAL INFECTION को अन्दर ही दवा दिया है, जो कि अपने COURSE के अनुसार चल रहा है और कुछ समय बाद वह पिफर वापस आ जायेगा । जब मैने अपनी होमियोपैथिक कैरियर का शुरूआत किया था तो इन सभी का प्रयोग किया था, अपने आत्म विश्वास को वापस पाने के लिए सभी को आजमाया था, कई दवाएँ व कई-कई बार रिपीटिशन करता था जिसका परिणाम यह होता था कि केस ऐलोपैथों के पास चला जाता था, जो कि यह कहते हुए जाते थे कि सीरियस बीमारियों का ईलाज होमियोपैथी में है ही नहीं । हममें से सभी के साथ ऐसा ही हुआ है, लेकिन एक बात हम सभी मानते एवं जानते है कि किसी भी स्थिति होे और कैसी भी परिस्थिति हो, अगरRIGHT SIMILIMUM दवा मिल जाती तो एक केस भी हमारे पास से कहीं भी नही जाने वाला था। अगर हमें रोगग्रस्त रोगी का ईलाज करते, ना कि रोगी में ग्रसित बीमारी का । सही मानिए, अगर इस एक लाईन को सही तरह ‘‘इसके भाव के साथ’’ समझ गयें, तो पिफर कोई रोग हमसे बच नही सकता और ना हमें डरा सकता है, क्योकि अब हमें रोग नही रोगी दिखाई देने लगेगा । तब ही हम अपनी चिकित्सा में रोगी के साथ, होमियोपैथी के साथ और साथ ही अपने साथ भी न्याय कर सकेंगे । ये चीजें हमारी उत्साह और साहस बढ़ाने वाली है, आइये, हम बीमारी से लगें । हमें ध्यान रखना होगा, आज की नई MODERN MEDICINE को देखिये, जिसमें ‘‘टीकाकरण’’ भी है, यह होमियोपैथिक सि(ान्त की देनें है, इसमें जरा भी संदेह नही होना चाहिए। अब करोड़ रूपये का सवाल यह है कि अगर ऐलोपैथ, होमियोपैथिक सि(ान्त को अपना सकते है जैसे कि TUBERCULOSIS से रक्षा के लिए TUBERCULAR BACILLI को रोगी को देते है और TETANOUS TOXID को TETANOUS ठीक करने में उपयोग कर है, और वो भी बार-बार नही बल्कि 3-3 महीनों पर एक खुराक का डोज देते है और जिससे इन्सान स्वस्थ रहता है, तो क्यों नही हम होमियोपैथ अपने ‘‘सि(ान्तों’’ पर भरोसा करते है? जब एक ऐलोपैथ एकल औषध्ी सि(ान्त एवं एक डोज पर विश्वास करने लगे है पिफर हम इन सबके बाद, किसी रोगी की रक्षा करने के लिए 1 या 2 दवाओं की एक साथ क्यों जरूरत पड़ती है? जिनका की सि(ान्त ही है, एक दवा और एक खुराक । आईये, वापस अपने केस पर चलते है, यहाँ इस केस में ठण्ड, ठण्ड का समय या ठण्ड का प्रकार, सिरदर्द पसीना का समय ये महत्वपूर्ण तो है पर ज्यादा नही । यह जाड़ा और कपकपी सिपर्फ बीमारी का एक लक्षण है और एक साधरण प्रक्रिया है, गर्मी उत्पन्न होने के एहसास का । यह अपने आप ही पैदा होता है, जब कोई व्यक्ति रोग के गिरपफत में होता है । CHILL औरSHIVERING का उत्पन्न होना को मान लें शरीर की एक ऐसी प्रक्रिया जिसके कारण गर्मी उत्पन्न होने की व्यवस्था शुरू हो रही है । ऐसा इसलिए होता है कि शरीर जड़त्व पैदा कर, गर्मी उत्पन्न करता है क्योंकि शरीर उस गर्मी से BACTERIA या VIRUS या PARACITE को खत्म करना चाहता है । यह शरीर की अपनी व्यवस्था है, अपने आप को बचाने के लिए। इसमें कोई संदेह नही है कि अलग-अलग व्यक्ति में अलग तरह की सुरक्षा की व्यवस्था होती है, पर इस रोगी की रेपर्टरी से दवा SELECT करना सही नही हो सकता हे बल्कि CONFUSION बढ़ा रहा है । अगर इन सबको ध्यान में नही रखेंगे तो क्या दवा PRESCRIBE करेंगेे । हम लोग रोगी व्यक्ति के ईलाज में ध्यान दें व्यक्ति या उसके व्यक्तित्व में जो परिवत्र्तन आया है, उसे समझे तभी SIMILIMUM दें सकेंगे । NO DOUBT , प्रत्येक लक्षण, चाहे वो दर्द हो या जाड़ा या किसी तरह का बुखार, यह रोगी व्यक्ति का प्रतिनिध्त्वि करते है, लेकिन इसके कुछ और भी प्रतिनिध् िजो इसका प्रतिनिध्त्वि करते हैं और ये होते हैं, मुख्य प्रतिनिध् िजो VITAL FORCE के है । पर नयी बीमारी में जिसको की अन्य मुख्य लक्षणों के साथ जोड़कर SIMILIMUM तक पहुँचाते है ।
डा० अशोक गुप्ता
होमियोपैथिक माईन्ड july-sept 200